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#1
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प्यास दरिया कि निगाहों से छिपा रखि है एक बादल से बडी आस लगा रखि है तेरी आखों की कशिश कैसे तुझे सम'झाउँ इन चार'गों ने मेरी नीदं उडा रखि है तेरी बातों को छुपाना नहीं आता मुझे तुने खुश'बू मेरे लह्ज़े में बसा रखि है खुद को तन्हा ना समझ लेना नये दीवानों नींद शह'रों की उस'ने उडा रखि है |
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