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#1
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यह जो रात चुरा बैठी है, चांद सितारों की तरुणाई बस तब तक कर ले मनमानी जब तक कोई किरण न आयी खुलते ही पल’कें फूलों की, बजते ही भ्रम’रों की वंशी छिन्न-भिन्न होगी यह स्याही, जैसे तेज धारा से कोई तम के पांव नहीं होते वोह चलता थाम ज्योति का आंचल मेरे प्यार निराश न होकर फिर फूल खिलेगा, सूर्य मिलेगा मेरे देश उदास न हो, फिर दीप जलेगा तिमिर ढलेगा |
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