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ग़ज़ल-ऐ-खामोश

ग़ज़ल-ऐ-खामोश

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उसको सोचू या न सोचू, दिल मेरा खामोश है
नाम आता है बार बार, लेकिन होंठ मेरा बेहोश है

ये बारिश की बूंदें, ये बदल काले काले
दिल में यादें उसकी, सारा समां मदहोश है

नयी उमंग, नए तराने और नया नया सा गम इश्क़ का
पाने की आरज़ू है उसको, और दिल में भरा जोश है

एक मुद्दत से नहीं मिला में उस से एक मुद्दत से दिल वीरान है
हर एक दिन जैसे जंगल हो, और ज़िन्दगी जैसे खानाबदोश है

नहीं लगता अब मेरे घर में महफ़िल-ऐ-यार यारो की
उसकी मोहोब्बत के कारण, सबके दिलो में बहुत रोश है

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ग़ज़ल-ऐ-इश्क़-ऐ-मोहोब्बत

ग़ज़ल-ऐ-इश्क़-ऐ-मोहोब्बत

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जब भी उसके ज़ुल्फ़ों को बात चली
आँखों से आंसुओं की धार चली

दिल की बातों पर इक्तियार न करना कभी
ये कईओं को बेरहमी से मार चली

इश्क़ की रहनुमाई करते-२ थक जाता है दिल
इश्क़ की राहों पर खुवाईशैं बेकार चली

गम और तन्हाइयों का साया ज़िन्दगी पर
धड़कने भी दिल की उधार चली

खता क्या थी अपनी ये हम समझ न सके
वो हमसे रूठ कर यूँ भी बेज़ार चली

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ग़ज़ल-ऐ-शख्शियत

ग़ज़ल-ऐ-शख्शियत

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मैं अपनी तुमको आज शख्शियत बताता हूँ
के रिश्ते मैं दुनिया के सारे ही निभाता हूँ

डरता नहीं हू मैं किसी से इस जहाँ में मगर
उस खुद के दर पर ही अपना सर झुकाता हूँ

ख़ुशी और गम का मेल बड़ा बेमोल होता है
मैँ इन दोनों को ही हर पल अपना बनाता हूँ

ज़र्रे ज़र्रे से खुशबू आये मेरे मोहोब्बत की
हर गली, हर कुंचा मैँ फूलों से सजाता हूँ

हो न जाए कही अँधेरा उसकी गलियों में
इसलिए भी मैँ इन चिरागों को जलाता हूँ

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मेरी यादों में आ, मेरी बातों में आ

मेरी यादों में आ, मेरी बातों में आ

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मेरी यादों में आ
मेरी बातों में आ
लगी है आग दिल में
उसको बुझाने को आ

मेरी आँखों में आ
मेरे दिल में समां
दर्द जो है दिल में
उसको मिटाने को आ

मेरी ज़िन्दगी में आ
मेरी ज़िन्दगानी को बदल जा
खुवाईशैं है बहुत मेरे दिल में
उसको मिलाने को आ

मेरी हर सुबहों में आ
मेरी हर शामों में आ
है इंतज़ार में मेरा दिल
उसको कुछ बताने को आ

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ग़ज़ल-ऐ-याद-ऐ-तड़प

ग़ज़ल-ऐ-याद-ऐ-तड़प

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उसकी याद जब आती है मुझ को
दिल मेरा ताड ताड हो जाता है

दिल में उठता है अजीब सा दर्द
और आंसुओं का अंबार हो जाता है

लगता है मेला मेरी आँखों में चेहरे का
और तेज़ तेज़ दिल का धरकना बार बार हो जाता है

हो जाती है फनाह मेरी शख्शियत उस पल लोगो
और मेरा दिल भी एकदम लाचार हो जाता है

उम्मीद अब तक है मेरे इस कम्बक्त दिल को
क्या करू ये दिल भी अब बेज़ार हो जाता है

कोई तो बता दो मुझे लोगो उस इंसानो के बारे में
कहा जाए वो इंसान जो इश्क़ में बेकार हो जाता है

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ग़ज़ल-ऐ-ज़िन्दगी, अपनी ज़िन्दगी को

ग़ज़ल-ऐ-ज़िन्दगी, अपनी ज़िन्दगी को…

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अपनी ज़िन्दगी को में आज़माता जा रहा हूँ
इसको हर पल गम से सजाता जा रहा हूँ

याद में अब भी वो बाकी है मेरे
सुबह, शाम, दिन, रात उसको बुलाता जा रहा हूँ

कहता है वो अब और कितना इंतज़ार करू
अपने दिल को हर रोज़ मनाता जा रहा हूँ

चेहरे पर अब रोनक की लहर नहीं दिखती
चेहरे को आंसुओं से सजाता जा रहा हूँ

डर लगता है अब तो मुझ को उजालों से
सारे चिराग में बुझाता जा रहा हूँ

मिलेगा क्या मुझे ऐसा कर के जानता नहीं
बस तस्सली-ऐ-दिल के लिए अँधेरा फैलाता जा रहा हूँ

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