ADVERTISEMENT
उनके शहर में कोई भी हमारा न था

उनके शहर में कोई भी हमारा न था…

Copy Ghazal

उनके शहर में कोई भी हमारा न था,
सभी अजनबी थे कोई सहारा न था।

तमन्ना थी कुछ करने की कुछ कर गये होते,
अपनी किसमत का बुलन्द सितारा न था।

चोट पे चोट देते रहे लोग मुझे,
किसी ने अपना कह कर पुकारा न था।

आ कर खो गये हम भीड़ के समन्दर में,
साहिल तो बहुत थे पर किनारा न था।

ढूँढता रहा अपनी मंज़िलों को ‘असद’
हमें किसी ने मंज़िलों पे उतारा न था।

 ~
ADVERTISEMENT

Add a Comment

SPONSORED POSTS
loading...