कब से सता रहा है कोई मेहरबाँ मुझको

कब से सता रहा है कोई मेहरबाँ मुझको…

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ये रास आये भला किस तरह जहाॅ मुझको,
कब से सता रहा है कोई मेहरबाँ मुझको।
ना जाने क्या मेरी नज़रों में हो गया ऐ दोस्त,
बहार में भी नज़र आती है अब खिज़ा मुुझको।
बहाता ना आंसू उसकी तलाश में हरगिज़,
नज़र जो आता दूर से ही आशियाँ मुझको।
तू गम ज़दा न हो खुशियों से झूम जा ऐ दिल,
दिखाई देते है मंजिल के अब निशा मुझको।
दुआ मांगू यही मैं अब हर मर्तबा तुझसे,
नज़रों में किसी के भी ना गिरा मुझको।

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