ग़ज़ल-ऐ-ज़िन्दगी, अपनी ज़िन्दगी को

ग़ज़ल-ऐ-ज़िन्दगी, अपनी ज़िन्दगी को…

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अपनी ज़िन्दगी को में आज़माता जा रहा हूँ
इसको हर पल गम से सजाता जा रहा हूँ

याद में अब भी वो बाकी है मेरे
सुबह, शाम, दिन, रात उसको बुलाता जा रहा हूँ

कहता है वो अब और कितना इंतज़ार करू
अपने दिल को हर रोज़ मनाता जा रहा हूँ

चेहरे पर अब रोनक की लहर नहीं दिखती
चेहरे को आंसुओं से सजाता जा रहा हूँ

डर लगता है अब तो मुझ को उजालों से
सारे चिराग में बुझाता जा रहा हूँ

मिलेगा क्या मुझे ऐसा कर के जानता नहीं
बस तस्सली-ऐ-दिल के लिए अँधेरा फैलाता जा रहा हूँ

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