ग़ज़ल-ऐ-शख्शियत

ग़ज़ल-ऐ-शख्शियत

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मैं अपनी तुमको आज शख्शियत बताता हूँ
के रिश्ते मैं दुनिया के सारे ही निभाता हूँ

डरता नहीं हू मैं किसी से इस जहाँ में मगर
उस खुद के दर पर ही अपना सर झुकाता हूँ

ख़ुशी और गम का मेल बड़ा बेमोल होता है
मैँ इन दोनों को ही हर पल अपना बनाता हूँ

ज़र्रे ज़र्रे से खुशबू आये मेरे मोहोब्बत की
हर गली, हर कुंचा मैँ फूलों से सजाता हूँ

हो न जाए कही अँधेरा उसकी गलियों में
इसलिए भी मैँ इन चिरागों को जलाता हूँ

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