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ग़ज़ल-ऐ-खामोश

ग़ज़ल-ऐ-खामोश

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उसको सोचू या न सोचू, दिल मेरा खामोश है
नाम आता है बार बार, लेकिन होंठ मेरा बेहोश है

ये बारिश की बूंदें, ये बदल काले काले
दिल में यादें उसकी, सारा समां मदहोश है

नयी उमंग, नए तराने और नया नया सा गम इश्क़ का
पाने की आरज़ू है उसको, और दिल में भरा जोश है

एक मुद्दत से नहीं मिला में उस से एक मुद्दत से दिल वीरान है
हर एक दिन जैसे जंगल हो, और ज़िन्दगी जैसे खानाबदोश है

नहीं लगता अब मेरे घर में महफ़िल-ऐ-यार यारो की
उसकी मोहोब्बत के कारण, सबके दिलो में बहुत रोश है

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