ग़ज़ल-ऐ-इश्क़-ऐ-मोहोब्बत

ग़ज़ल-ऐ-इश्क़-ऐ-मोहोब्बत

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जब भी उसके ज़ुल्फ़ों को बात चली
आँखों से आंसुओं की धार चली

दिल की बातों पर इक्तियार न करना कभी
ये कईओं को बेरहमी से मार चली

इश्क़ की रहनुमाई करते-२ थक जाता है दिल
इश्क़ की राहों पर खुवाईशैं बेकार चली

गम और तन्हाइयों का साया ज़िन्दगी पर
धड़कने भी दिल की उधार चली

खता क्या थी अपनी ये हम समझ न सके
वो हमसे रूठ कर यूँ भी बेज़ार चली

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