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ग़ज़ल-ऐ-बेवफाई, आँख में गिरता हुआ पानी

ग़ज़ल-ऐ-बेवफाई, आँख में गिरता हुआ पानी…

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ये जो मेरी आँख में गिरता हुआ पानी है
ये मेरी एक बिखड़ी हुई ज़िन्दगानी है

हो गया हू में जैसे हो कोई जिन्दा लाश
खुद खैर करे, ये कैसी मेरी जवानी है

करूँगा नहीं में बर्बाद किसी को उसकी तरह
मैंने और मेरे दिल ने अब यही बात ठानी है

लोग जो पूछे तो क्या कहू बस यही सोचता हू मैँ
मेरी ज़िन्दगी की कहानी मेरी ही ज़ुबानी है

मिले चाहे गम या फिर खुशियों का मेला
सब कुछ समेट कर रखना मेरी आदत पुरानी है

दगा दिया उसने मुझे तो इस में ताज़्ज़ुब कैसा
बेवफाई तो उसकी आदत खानदानी है

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