आशियाँ ये हमारा तो गुलज़ार होता

आशियाँ ये हमारा तो गुलज़ार होता…

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आशियाँ ये हमारा तो गुलज़ार होता,
यू आ कर न जाते न बेज़ार होता।

कैसे मिले दिल को सुकून ये बताओ,
हदों में ही रहते हम न बेकरार होता।

कैसे रहे हम अब जुदा हो कर उनसे,
न खाते हम ठोकर न उनसे प्यार होता।

कैसे बयां करू अब मै उन लफ्ज़ो को,
खामोश ही रहते हम न इज़हार होता।

समेटी है खुशियां जिन्दगी में आ के ‘असद’,
अगर वो न जाते ये मौसमे बहार रहता।

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