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होंठ जैसे गुलाब के फूल हो

॥ होंठ जैसे गुलाब के फूल हो ॥

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होंठ जैसे गुलाब के फूल हो
बाल जैसे काली काली घटा

आँख जैसे गहरा सागर
पलकों पर जैसे हर मौसम फ़िदा

हर एक मुस्कान पर मरे कितने ही
उसकी है हर बात निराली और जुदा

नज़र उठे तो घटा छा जाये
नज़र गिरे तो हो जाये बारिश

और क्या कहू उसकी शान में आप सब से
बस छोटी सी ये एक मिसाल है उसके हसन की।

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इश्क़ ग़ज़ल, ये ताजमहल देखो हमें याद दिलाता है

इश्क़ ग़ज़ल, ये ताजमहल देखो हमें याद दिलाता है…

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ये ताजमहल देखो हमें याद दिलाता है
होती है क्या मुहब्बत ये सबको बताता है

लिखी है इसमे देखो दास्ताने मुहब्बत की
होती है कैसे देखो इबादत ये मुहब्बत की

ये बेजुवॉ है पर कहानी ये सुनाता है
होती है क्या मुहब्बत ये सबको बताता है

चाहा था उसने कितना कितनी मुहब्बत की थी
अपने प्यार की निषानी सारे जहॉ को दी थी

सच्ची मुहब्बत क्या है ये हमको सिखाता है
होती है क्या मुहब्बत ये सबको बताता है

है कितनी खूबसूरत संगमरमर की इमारत
इसमे की थी उसने मुमताज की इबादत

सदियों रहेगी याद अहसास कराता है
होती है क्या मुहब्बत ये सबको बताता है

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तन्हाइयों से भरी

तन्हाइयों से भरी

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तन्हाइयों से भरी ज़िन्दगी है
और दिल मेरा वीरान है

चाहत भी क्या चाहत है उसकी
वो बेवफा बहुत महान है

मोहोब्बत लव्ज़ यूँ तो बफ दिखाती है
मगर ये भी बेवफाई से थोड़ी अनजान है

सब कुछ लुटा देते है लोग इस के कारण
इसलिए भी चाहत इसका नाम है

क्यों जलते हो तुम सब मुझ से
जिसका नाम है इस में वही तो बदनाम है

मिले अगर तन्हाई और गम तो अचरज न करना
के यही तो एक हसीन मोहोब्बत का अंजाम है

क्या हुआ जो उस ने तुमको ठुकरा दिया
और क्यों ले रखा तुमने अपने हाथों में जाम है

सुबह शाम, दिन रात बस मेहबूब को सोचना
बस एक यही इस इश्क़ का काम है

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ग़ज़ल-ऐ-खामोश

ग़ज़ल-ऐ-खामोश

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उसको सोचू या न सोचू, दिल मेरा खामोश है
नाम आता है बार बार, लेकिन होंठ मेरा बेहोश है

ये बारिश की बूंदें, ये बदल काले काले
दिल में यादें उसकी, सारा समां मदहोश है

नयी उमंग, नए तराने और नया नया सा गम इश्क़ का
पाने की आरज़ू है उसको, और दिल में भरा जोश है

एक मुद्दत से नहीं मिला में उस से एक मुद्दत से दिल वीरान है
हर एक दिन जैसे जंगल हो, और ज़िन्दगी जैसे खानाबदोश है

नहीं लगता अब मेरे घर में महफ़िल-ऐ-यार यारो की
उसकी मोहोब्बत के कारण, सबके दिलो में बहुत रोश है

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ग़ज़ल-ऐ-इश्क़-ऐ-मोहोब्बत

ग़ज़ल-ऐ-इश्क़-ऐ-मोहोब्बत

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जब भी उसके ज़ुल्फ़ों को बात चली
आँखों से आंसुओं की धार चली

दिल की बातों पर इक्तियार न करना कभी
ये कईओं को बेरहमी से मार चली

इश्क़ की रहनुमाई करते-२ थक जाता है दिल
इश्क़ की राहों पर खुवाईशैं बेकार चली

गम और तन्हाइयों का साया ज़िन्दगी पर
धड़कने भी दिल की उधार चली

खता क्या थी अपनी ये हम समझ न सके
वो हमसे रूठ कर यूँ भी बेज़ार चली

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ग़ज़ल-ऐ-शख्शियत

ग़ज़ल-ऐ-शख्शियत

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मैं अपनी तुमको आज शख्शियत बताता हूँ
के रिश्ते मैं दुनिया के सारे ही निभाता हूँ

डरता नहीं हू मैं किसी से इस जहाँ में मगर
उस खुद के दर पर ही अपना सर झुकाता हूँ

ख़ुशी और गम का मेल बड़ा बेमोल होता है
मैँ इन दोनों को ही हर पल अपना बनाता हूँ

ज़र्रे ज़र्रे से खुशबू आये मेरे मोहोब्बत की
हर गली, हर कुंचा मैँ फूलों से सजाता हूँ

हो न जाए कही अँधेरा उसकी गलियों में
इसलिए भी मैँ इन चिरागों को जलाता हूँ

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ग़ज़ल-ऐ-याद-ऐ-तड़प

ग़ज़ल-ऐ-याद-ऐ-तड़प

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उसकी याद जब आती है मुझ को
दिल मेरा ताड ताड हो जाता है

दिल में उठता है अजीब सा दर्द
और आंसुओं का अंबार हो जाता है

लगता है मेला मेरी आँखों में चेहरे का
और तेज़ तेज़ दिल का धरकना बार बार हो जाता है

हो जाती है फनाह मेरी शख्शियत उस पल लोगो
और मेरा दिल भी एकदम लाचार हो जाता है

उम्मीद अब तक है मेरे इस कम्बक्त दिल को
क्या करू ये दिल भी अब बेज़ार हो जाता है

कोई तो बता दो मुझे लोगो उस इंसानो के बारे में
कहा जाए वो इंसान जो इश्क़ में बेकार हो जाता है

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